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40 घंटे से अंधेरे में तड़प रहा बरपाली क्षेत्र, “सुशासन” सिर्फ पोस्टर और भाषणों में! अधिकारी गायब, नेता मौन, जनता बेहाल

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40 घंटे से अंधेरे में तड़प रहा बरपाली क्षेत्र, “सुशासन” सिर्फ पोस्टर और भाषणों में! अधिकारी गायब, नेता मौन, जनता बेहाल

लोक प्लस न्यूज़ बरपाली/कोरबा — अगर यही “सुशासन” है तो फिर बदहाल व्यवस्था किसे कहेंगे? भीषण गर्मी में बरपाली समेत आसपास के दर्जनों गांव पिछले लगभग 40 घंटे से अंधेरे और पानी संकट में नरक जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं, लेकिन विद्युत विभाग के जिम्मेदार अधिकारी और क्षेत्र के नेता मानो गहरी नींद में सोए हुए हैं।

हर महीने “मेंटेनेंस” के नाम पर घंटों बिजली काटने वाला विभाग पहली ही आंधी और बारिश में घुटनों पर आ गया। एक महुआ का पेड़ 33 केवी और 11 केवी लाइन पर क्या गिरा, पूरे सिस्टम की पोल खुल गई। तार टूट गए, शासकीय विद्यालय बरपाली की बाउंड्रीवाल तक क्षतिग्रस्त हो गई और पूरा इलाका अंधेरे में डूब गया। सवाल यह है कि आखिर करोड़ों रुपए का मेंटेनेंस जाता कहां है?

बरपाली, सलिहाभांठा, पकरिया, बंधवाभांठा, डोंगरीभांठा समेत दर्जनों गांवों में हालात इतने खराब हैं कि लोग बूंद-बूंद पानी के लिए भटक रहे हैं। बोर मशीनें बंद पड़ी हैं, तालाब सूख चुके हैं, घरों में पंखे-कूलर बंद हैं, मोबाइल तक चार्ज नहीं हो पा रहे। छोटे बच्चे गर्मी से बिलख रहे हैं, बुजुर्ग पूरी रात जागकर काट रहे हैं और महिलाएं पानी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों को शायद जनता की तकलीफ से कोई मतलब नहीं। ग्रामीण लगातार फोन लगा रहे हैं, मगर अधिकारी फोन उठाना तक जरूरी नहीं समझ रहे। जनता गर्मी में तड़प रही है और विभागीय अफसर शायद AC कमरों में आराम फरमा रहे हैं।

सबसे बड़ा तमाचा उन “जन समस्या निवारण शिविरों” पर है, जिनका सरकार दिन-रात प्रचार करती नहीं थकती। अगर जनता को बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधा भी नहीं मिल पा रही, तो आखिर ये शिविर किस काम के? क्या सिर्फ फोटो खिंचवाने, सोशल मीडिया पोस्ट डालने और झूठे सुशासन का ढोल पीटने के लिए ये तमाशा किया जा रहा है?

हैरानी की बात यह है कि नेताओं और पत्रकारों की नगरी कहे जाने वाले बरपाली की यह हालत है। यही क्षेत्र पूर्व गृह मंत्री ननकी राम कंवर और पूर्व सांसद स्वर्गीय बंसीलाल महतो का गृह ग्राम रहा है, फिर भी जनता 40 घंटे से अंधेरे में सड़ रही है। आखिर क्षेत्र के नेता, मंत्री और जनप्रतिनिधि कहां गायब हैं? क्या चुनाव खत्म होते ही जनता की परेशानी देखने की जिम्मेदारी भी खत्म हो जाती है?

विद्युत विभाग के कर्मचारी खुद कह रहे हैं कि स्टाफ की भारी कमी है और तीन रातों से लगातार काम कर रहे हैं। तो सवाल सीधा है — जब हर साल आंधी-बारिश आती है, तब विभाग पहले से तैयारी क्यों नहीं करता? क्या पूरे सिस्टम को जानबूझकर भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है?

ग्रामीणों का गुस्सा अब फूटने लगा है। लोगों ने साफ चेतावनी दी है कि अगर जल्द बिजली व्यवस्था बहाल नहीं हुई तो उग्र आंदोलन होगा और फिर उसकी पूरी जिम्मेदारी विद्युत विभाग, प्रशासन और क्षेत्र के नेताओं की होगी।

अब जनता पूछ रही है — आखिर कब तक गांवों को अंधेरे में मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा? और कब तक अधिकारी सिर्फ फाइलों में “व्यवस्था दुरुस्त” लिखकर अपनी जिम्मेदारी से भागते रहेंगे? इसको दूसरा रूप मे न्यूज़ फार्मट मे दीजिए

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